नई दिल्ली/रांची चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर बुधवार को राजनीतिक बहस तेज हो गई। द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन आपत्तियों में कुछ फैसले उनकी जानकारी के बिना लिए जाने का मुद्दा उठाया गया था।
रिपोर्ट के अनुसार, आपत्तियों का संबंध नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने और बहाल करने, Form-6, पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से जुड़े मामलों और चुनावी डेटा के सॉफ्टवेयर प्रबंधन से था। दोनों चुनाव आयुक्तों ने चुनावी डेटाबेस के केंद्रीकरण को लेकर भी चिंता जताई थी।
विनोद पांडेय ने CEC पर उठाए सवाल
इस रिपोर्ट के बाद झारखंड मुक्ति मोर्चा के केंद्रीय महासचिव विनोद कुमार पांडेय ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग तीन सदस्यों वाली संवैधानिक संस्था है और आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना चाहिए।
पांडेय ने SIR यानी Special Intensive Revision की प्रक्रिया और मतदाता सूची में बदलाव को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग की और पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट से संज्ञान लेने की अपील की।
चुनाव आयोग की ओर से अलग पक्ष
वहीं, चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों ने हिंदुस्तान टाइम्स को बताया कि SIR समेत आयोग के सभी फैसलों को तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी मिली थी और सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए। यह पक्ष द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में सामने आई आपत्तियों के संदर्भ में आयोग की अलग व्याख्या प्रस्तुत करता है।
इस मामले में फिलहाल मुख्य मुद्दा आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों, उनके कारणों और उन पर हुई कार्रवाई को लेकर है।


