नई दिल्ली :- झारखंड सहित पाँचवीं अनुसूची वाले राज्यों में परिसीमन के दौरान आदिवासी समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की सुरक्षा को लेकर झारखंड सरकार के पूर्व मंत्री बंधु तिर्की ने केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने केंद्रीय मंत्री को विस्तृत ज्ञापन और विशेषज्ञों की कानूनी राय सौंपते हुए आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों का वर्तमान अनुपात सुरक्षित रखने की मांग की।
मुलाकात के दौरान ऑल इंडिया आदिवासी कांग्रेस (AICC) के राष्ट्रीय समन्वयक शशि पन्ना भी मौजूद थे। बंधु तिर्की ने कहा कि परिसीमन के बाद यदि लोकसभा और विधानसभा की कुल सीटों की संख्या बढ़ती है, तो अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों में भी उसी अनुपात में वृद्धि सुनिश्चित की जानी चाहिए। ऐसा नहीं होने पर झारखंड सहित अन्य राज्यों में आदिवासी समुदाय का राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है।
संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 में संशोधन की मांग
बंधु तिर्की ने संविधान के अनुच्छेद 330(2) और 332(3) में आवश्यक संशोधन करने का आग्रह किया। उनका कहना है कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों का मौजूदा अनुपात सुरक्षित रहना चाहिए, ताकि परिसीमन के बाद आदिवासी समुदाय की राजनीतिक भागीदारी कमजोर न पड़े।
पाँचवीं अनुसूची वाले राज्यों को भी मिले विशेष संरक्षण
बंधु तिर्की ने प्रस्तावित 131वें संविधान संशोधन विधेयक, 2026 (विधेयक संख्या 107) का उल्लेख करते हुए कहा कि अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा के लिए प्रस्तावित विशेष प्रावधानों की तर्ज पर झारखंड सहित अन्य पाँचवीं अनुसूची वाले राज्यों के आदिवासी समुदायों के प्रतिनिधित्व की सुरक्षा के लिए भी प्रभावी संवैधानिक और कानूनी व्यवस्था होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि पाँचवीं अनुसूची वाले राज्यों की ऐतिहासिक, सामाजिक और संवैधानिक परिस्थितियों को देखते हुए परिसीमन से जुड़े कानूनों में स्पष्ट सुरक्षा प्रावधान जरूरी हैं।
2007 के परिसीमन का दिया उदाहरण
ज्ञापन में वर्ष 2007 की परिसीमन प्रक्रिया का भी उल्लेख किया गया। बंधु तिर्की के अनुसार, उस समय झारखंड विधानसभा में आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 28 से घटाकर 22 और लोकसभा में 5 से घटाकर 4 करने का प्रस्ताव सामने आया था। इसके विरोध में राज्यभर में आंदोलन और प्रदर्शन हुए थे। संबंधित वैधानिक प्रावधानों के कारण यह कटौती लागू नहीं हो सकी।
उन्होंने कहा कि पिछले अनुभव को देखते हुए भविष्य में आदिवासी आरक्षित सीटों के अनुपात को सुरक्षित रखने के लिए स्पष्ट संवैधानिक संरक्षण आवश्यक है।
राज्यपाल, TAC और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की भूमिका पर जोर
बंधु तिर्की ने मांग की कि परिसीमन से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णयों में पाँचवीं अनुसूची वाले राज्यों के राज्यपालों, जनजातीय सलाहकार परिषदों (TAC) और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) की भूमिका को उचित महत्व दिया जाए।
उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 338A(9) के अनुरूप अनुसूचित जनजातियों को प्रभावित करने वाले प्रमुख नीतिगत विषयों पर राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग से परामर्श सुनिश्चित करने की जरूरत भी बताई।
इसके अलावा, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 में आवश्यक संशोधन या पूरक कानूनी व्यवस्था बनाने और परिसीमन के आदिवासी समुदाय पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर विशेषज्ञ समिति गठित करने की मांग की गई।
केंद्रीय मंत्री ने ज्ञापन पर लिया संज्ञान
प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने ज्ञापन और उसमें प्रस्तुत कानूनी पहलुओं पर संज्ञान लिया। उन्होंने कहा कि विषय पर किसी तरह के स्पष्टीकरण या अतिरिक्त जानकारी की आवश्यकता होने पर संपर्क किया जाएगा।
बंधु तिर्की ने उम्मीद जताई कि केंद्र सरकार परिसीमन से संबंधित आगामी विधायी और नीतिगत फैसलों में आदिवासी समुदाय के संवैधानिक अधिकारों तथा राजनीतिक प्रतिनिधित्व को ध्यान में रखते हुए आवश्यक कदम उठाएगी।
मुलाकात के दौरान “परिसीमन का आदिवासी समाज पर प्रभाव एवं संभावित समाधान” शीर्षक रिपोर्ट भी सौंपी गई। इसके साथ झारखंड हाईकोर्ट के अधिवक्ता शुभाशिष रसिक सोरेन और एनयूएसआरएल, रांची के सहायक प्राध्यापक रामचंद्र उराँव के कानूनी अभिमत भी प्रस्तुत किए गए।


