लातेहार: झारखंड के लातेहार जिले के अम्बाटांड़ गांव स्थित उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय में शिक्षकों की कमी की गंभीर स्थिति सामने आई है। स्कूल में पहली से पांचवीं कक्षा तक 111 बच्चे पढ़ते हैं, लेकिन इन सभी बच्चों की पढ़ाई और स्कूल की दूसरी जिम्मेदारियां संभालने के लिए फिलहाल सिर्फ एक शिक्षक श्यामदेव उरांव तैनात हैं।
एक ही शिक्षक के भरोसे पांच कक्षाओं की पढ़ाई चलने से बच्चों को पढ़ाने में कई तरह की चुनौतियां सामने आती हैं। अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों को कई बार एक ही कमरे में बैठाकर पढ़ाना पड़ता है। ऐसे में शिक्षक को एक साथ अलग-अलग स्तर के विद्यार्थियों को पढ़ाने की जिम्मेदारी निभानी पड़ती है।
पढ़ाई के साथ स्कूल के दूसरे काम भी
शिक्षक श्यामदेव उरांव की जिम्मेदारी केवल पढ़ाने तक सीमित नहीं है। बच्चों की उपस्थिति दर्ज करने, जरूरी रिकॉर्ड तैयार करने और मिड डे मील की व्यवस्था व निगरानी जैसे काम भी उन्हें ही संभालने पड़ते हैं।
स्कूल में बच्चों के आने के बाद शिक्षक पहले उपस्थिति और अन्य जरूरी प्रक्रियाएं पूरी करते हैं। इसके बाद अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों की पढ़ाई शुरू होती है। एक शिक्षक के सामने चुनौती यह रहती है कि पांचों कक्षाओं के बच्चों को उनकी जरूरत के अनुसार समय और ध्यान कैसे दिया जाए।
झारखंड के हजारों स्कूलों में एक शिक्षक
शिक्षकों की कमी केवल अम्बाटांड़ के स्कूल तक सीमित नहीं है। शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, झारखंड में 9,827 प्राथमिक स्कूल ऐसे हैं, जहां केवल एक शिक्षक तैनात है।
अम्बाटांड़ का स्कूल इसी समस्या की जमीनी तस्वीर दिखाता है। पांच कक्षाओं और 111 बच्चों की जिम्मेदारी एक शिक्षक के ऊपर होने से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
बच्चों के भविष्य से जुड़ा सवाल
स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के लिए शिक्षक ही शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण आधार हैं। ऐसे में यदि एक ही शिक्षक को कई कक्षाओं के साथ प्रशासनिक और अन्य जिम्मेदारियां भी संभालनी पड़ें, तो प्रत्येक बच्चे पर पर्याप्त ध्यान देना मुश्किल हो सकता है।
अम्बाटांड़ के स्कूल की स्थिति शिक्षा व्यवस्था के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा करती है—जब पांच कक्षाओं के 111 बच्चों की जिम्मेदारी एक ही शिक्षक पर होगी, तो हर बच्चे को उसकी जरूरत के मुताबिक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे मिलेगी?
यह मामला केवल एक स्कूल की समस्या नहीं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षकों की उपलब्धता और सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता से जुड़ी बड़ी चुनौती की ओर भी ध्यान खींचता है।


